‘यह मनुष्य की शक्ति नहीं है?’’ (विवेकानन्द चरित, पृष्ठ 517)
हर साल कुछ संथाल स्त्री-पुरूष मठ की ज़मीन साफ करने आते थे। इस बरस भी आए। विवेकानन्द उठकर उनके पास चले जाते थे, कुछ अपनी कहते और कुछ उनकी सुनते थे। एक दिन जब वे संथालों से हंसी-ठिठोली कर रहे थे कुछ भद्र जन उनसे मिलने आए। स्वामी जी ने उन्हें यह कहकर लौटा दिया, ‘‘मैं अब किसी से मिल न सकूंगा, इनके साथ बड़े मजे़ में हूं।
उन्होंने एक दिन इस संथाल को अपने मठ में भोजन के लिए आमंत्रित
‘यह मनुष्य की शक्ति नहीं है?’’ (विवेकानन्द चरित, पृष्ठ 517)
हर साल कुछ संथाल स्त्री-पुरूष मठ की ज़मीन साफ करने आते थे। इस बरस भी आए। विवेकानन्द उठकर उनके पास चले जाते थे, कुछ अपनी कहते और कुछ उनकी सुनते थे। एक दिन जब वे संथालों से हंसी-ठिठोली कर रहे थे कुछ भद्र जन उनसे मिलने आए। स्वामी जी ने उन्हें यह कहकर लौटा दिया, ‘‘मैं अब किसी से मिल न सकूंगा, इनके साथ बड़े मजे़ में हूं।
उन्होंने एक दिन इस संथाल को अपने मठ में भोजन के लिए आमंत्रित