‘‘देखो, ये दीन-हीन निरक्षर जन कितने सरल-हृदय हैं। क्या तुम इनका कष्ट कुछ भी कम न कर सकोगे? अन्यथा हमारे गेरूआ धारण करने का क्या प्रयोजन होगा ? कभी-कभी मेरा मन कहता है, मठ फट सब बेचकर इन सब दुःखी दरिद्रनारायणों में बांट दूं। हम वृक्ष की छाह तले बसेरा करने वालों को घर-द्वार की चिंता क्यों हो? हाय, जब हमारे देशवासी रोटी-कपड़े को तरस रहे हों तो क्या हम अपने मुख का ग्रास देते लज्जित नहीं होते ? मां, क्या इनकी कोई निष्कृति नहीं ? तुम जानते हो,
‘‘देखो, ये दीन-हीन निरक्षर जन कितने सरल-हृदय हैं। क्या तुम इनका कष्ट कुछ भी कम न कर सकोगे? अन्यथा हमारे गेरूआ धारण करने का क्या प्रयोजन होगा ? कभी-कभी मेरा मन कहता है, मठ फट सब बेचकर इन सब दुःखी दरिद्रनारायणों में बांट दूं। हम वृक्ष की छाह तले बसेरा करने वालों को घर-द्वार की चिंता क्यों हो? हाय, जब हमारे देशवासी रोटी-कपड़े को तरस रहे हों तो क्या हम अपने मुख का ग्रास देते लज्जित नहीं होते ? मां, क्या इनकी कोई निष्कृति नहीं ? तुम जानते हो,