दी। गुरू-भाई तथा शिष्य किसी मामले में उनकी सलाह पूछते थे वे कह देते थे-‘‘जैसा तुम्हारी समझ में आए, वैसा करो।’’
1902 की चार जुलाई के दिन उनकी तबीयत अकस्मात् सम्भली। वे सुबह-सवेरे उठे और सबके साथ बैठकर प्रसन्न मुख से अतीत की बातें करने लगे। दो-तीन सज्जन बाहर से मिलने आए तो स्वामी जी ने उनके साथ इधर-उधर की बातेें कीं और एक साथ चाय पी। इसके बाद वे एकाएक उठे और ठाकुर-घर के भीतर जाकर दरवाजे़ और खिड़कियां बन्द कर लीं। इससे
दी। गुरू-भाई तथा शिष्य किसी मामले में उनकी सलाह पूछते थे वे कह देते थे-‘‘जैसा तुम्हारी समझ में आए, वैसा करो।’’
1902 की चार जुलाई के दिन उनकी तबीयत अकस्मात् सम्भली। वे सुबह-सवेरे उठे और सबके साथ बैठकर प्रसन्न मुख से अतीत की बातें करने लगे। दो-तीन सज्जन बाहर से मिलने आए तो स्वामी जी ने उनके साथ इधर-उधर की बातेें कीं और एक साथ चाय पी। इसके बाद वे एकाएक उठे और ठाकुर-घर के भीतर जाकर दरवाजे़ और खिड़कियां बन्द कर लीं। इससे