सबको आश्चर्य हुआ क्यांेकि ऐसा वे पहले कभी नहीं किया करते थे। लगातार तीन घंटे भीतर बन्द रहे और उसके बाद आनन्द में मग्न वे धीरे-धीरे नीचे उतर आए। ‘मन, चल जिन निकेतन’ गुनगुनाते हुए वे आंगन में टहलने लगे-टहलते रहे। सबकी आंखें उन पर लगी हुई थीं। कहते हैं कि स्वामी प्रेमानन्द पास ही खड़े थे। उन्होंने सुना कि विवेकानन्द उच्चतम भावभूमि पर आरूढ़ होकर आप ही आप बड़बड़ा रहे हैं-‘‘यदि इस समय
208 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
कोई दूसरा विवेकानन्द होता वह समझ सकता,
सबको आश्चर्य हुआ क्यांेकि ऐसा वे पहले कभी नहीं किया करते थे। लगातार तीन घंटे भीतर बन्द रहे और उसके बाद आनन्द में मग्न वे धीरे-धीरे नीचे उतर आए। ‘मन, चल जिन निकेतन’ गुनगुनाते हुए वे आंगन में टहलने लगे-टहलते रहे। सबकी आंखें उन पर लगी हुई थीं। कहते हैं कि स्वामी प्रेमानन्द पास ही खड़े थे। उन्होंने सुना कि विवेकानन्द उच्चतम भावभूमि पर आरूढ़ होकर आप ही आप बड़बड़ा रहे हैं-‘‘यदि इस समय
208 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
कोई दूसरा विवेकानन्द होता वह समझ सकता,