28 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
होती चली गई। मानव जीवन का उद्देश्य क्या है? क्या सचमुच इस जड़ जगत को चलाने वाली कोई शक्तिमान सत्ता है? इस प्रकार के अनेकों सवाल उसके मस्तिष्क में उठने लगे। पाश्चात्य विज्ञान और दर्शनशास्त्र ने उसके मन में संदेह उत्पन्न कर दिए। नरेन्द्र जब किसी धर्म-प्रचारक को ईश्वर के बारे में भाषण देते सुनता तो झट पूछ बैठता, ‘‘क्यों महाशय, आपने ईश्वर के दर्शन किए हैं? ‘‘हां’’ या ‘‘ना’’ में उत्तर देने
28 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
होती चली गई। मानव जीवन का उद्देश्य क्या है? क्या सचमुच इस जड़ जगत को चलाने वाली कोई शक्तिमान सत्ता है? इस प्रकार के अनेकों सवाल उसके मस्तिष्क में उठने लगे। पाश्चात्य विज्ञान और दर्शनशास्त्र ने उसके मन में संदेह उत्पन्न कर दिए। नरेन्द्र जब किसी धर्म-प्रचारक को ईश्वर के बारे में भाषण देते सुनता तो झट पूछ बैठता, ‘‘क्यों महाशय, आपने ईश्वर के दर्शन किए हैं? ‘‘हां’’ या ‘‘ना’’ में उत्तर देने