के बजाए धर्म-प्रचारक उपदेश वाक्यों से उसे संतुष्ट करना चाहते और अपना पुस्तक-ज्ञान बघारने लगते। नरेन्द्र को तो प्रत्यक्षवादी की खोज थी। धर्म-प्रचारकों की रटी-रटाई सम्प्रदायगत बोलियां सुनकर वह प्रबल संदेहवादी हो गया।
पिता से विरासत में पाई हुई आलोचना-वृत्िा पर पाश्चात्य विचारों की सान चढ़ चुकी थी, अतएव पुस्तक-ज्ञान नरेन्द्र को शान्त नहीं कर पा रहा था। उसे अब एक जीते-जागते आदर्श की खोज थी। इसी खोज का वह कुछ मित्रों के साथ आदि ब्रह्मसमाज का सदस्य बन गया।
के बजाए धर्म-प्रचारक उपदेश वाक्यों से उसे संतुष्ट करना चाहते और अपना पुस्तक-ज्ञान बघारने लगते। नरेन्द्र को तो प्रत्यक्षवादी की खोज थी। धर्म-प्रचारकों की रटी-रटाई सम्प्रदायगत बोलियां सुनकर वह प्रबल संदेहवादी हो गया।
पिता से विरासत में पाई हुई आलोचना-वृत्िा पर पाश्चात्य विचारों की सान चढ़ चुकी थी, अतएव पुस्तक-ज्ञान नरेन्द्र को शान्त नहीं कर पा रहा था। उसे अब एक जीते-जागते आदर्श की खोज थी। इसी खोज का वह कुछ मित्रों के साथ आदि ब्रह्मसमाज का सदस्य बन गया।