गया। वास्तव में वह अन्दर ही अन्दर अपना काम करने लगा और उनकी जगह बम व पिस्तौल ने ले ली।’’ ‘‘कभी-कभी इक्के-दुक्के राजनैतिक खून भी होने लगे, जिनमें सबसे साहसपूर्ण खून 1907 में लन्दन की एक सभा संेसर कर्जन बाइली का हुआ था। यह खून मदनलाल ढींगरा ने किया था, जिसे बाद में फांसी दी गई। अभियुक्त को बचाने की कोशिश करने वाले डा. लाल काका नामक एक पारसी सज्जन को भी फांसी की सज़ा दी गई।’’ (पृष्ठ 66)
‘अनुशीलन’ नाम का क्रान्तिकारी गुप्त
गया। वास्तव में वह अन्दर ही अन्दर अपना काम करने लगा और उनकी जगह बम व पिस्तौल ने ले ली।’’ ‘‘कभी-कभी इक्के-दुक्के राजनैतिक खून भी होने लगे, जिनमें सबसे साहसपूर्ण खून 1907 में लन्दन की एक सभा संेसर कर्जन बाइली का हुआ था। यह खून मदनलाल ढींगरा ने किया था, जिसे बाद में फांसी दी गई। अभियुक्त को बचाने की कोशिश करने वाले डा. लाल काका नामक एक पारसी सज्जन को भी फांसी की सज़ा दी गई।’’ (पृष्ठ 66)
‘अनुशीलन’ नाम का क्रान्तिकारी गुप्त