212 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
सिर्फ अपने देश को विदेशी दासता से मुक्त करना चाहते हैं कि दूसरे पराधीन देश भी मुक्त हों और अपनी-अपनी जगह स्वतंत्र रहें। इस सम्यक् चिंतन के अभाव में राष्ट्रीय भावना विकसित तथा सुदृढ़ होने के बजाए भावुकता-पूर्ण मूर्खता में बदल गई और उससे प्रतिक्रियावाद फूला-फला।
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में रोमां रोलां और एच.जी. वेल्स इत्यादि पाश्चात्य चिंतकों ने राष्ट्र-राष्ट्र में द्वेष, युद्व तथा हिंसावाद का विरोध करते हुए विश्व-बंधुत्व,
212 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
सिर्फ अपने देश को विदेशी दासता से मुक्त करना चाहते हैं कि दूसरे पराधीन देश भी मुक्त हों और अपनी-अपनी जगह स्वतंत्र रहें। इस सम्यक् चिंतन के अभाव में राष्ट्रीय भावना विकसित तथा सुदृढ़ होने के बजाए भावुकता-पूर्ण मूर्खता में बदल गई और उससे प्रतिक्रियावाद फूला-फला।
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में रोमां रोलां और एच.जी. वेल्स इत्यादि पाश्चात्य चिंतकों ने राष्ट्र-राष्ट्र में द्वेष, युद्व तथा हिंसावाद का विरोध करते हुए विश्व-बंधुत्व,