देखा है। परन्तु विश्रृंखल भारतीय लोक समाज को बिना अपने राष्ट्र एकता का अनुभव कराए उसे विश्व मानव की एकता का बोध कराना भी कैसे सम्भव होता ? एक के माध्यम ही से दूसरे तक पहंुचा जा सकता है। हो, किन्तु मैं एक अन्य मार्ग ही उत्तम मानता हूं। वह अपेक्षतया अधिक दुर्गम है, परन्तु अपेक्षतया अधिक सीधा भी है, क्योंकि मैं भली-भांति जानता हूं कि राष्ट्र चेतना से वंचित रह जाते हैं। उनकी श्रद्वा और अनुभूति मार्ग ही में चूक जाती है....जो हो,
देखा है। परन्तु विश्रृंखल भारतीय लोक समाज को बिना अपने राष्ट्र एकता का अनुभव कराए उसे विश्व मानव की एकता का बोध कराना भी कैसे सम्भव होता ? एक के माध्यम ही से दूसरे तक पहंुचा जा सकता है। हो, किन्तु मैं एक अन्य मार्ग ही उत्तम मानता हूं। वह अपेक्षतया अधिक दुर्गम है, परन्तु अपेक्षतया अधिक सीधा भी है, क्योंकि मैं भली-भांति जानता हूं कि राष्ट्र चेतना से वंचित रह जाते हैं। उनकी श्रद्वा और अनुभूति मार्ग ही में चूक जाती है....जो हो,