वह विवेकानन्द का अभीष्ट न था क्योंकि इस विषय में वे गांधी के समान ही मानव-सेवा के प्रयोजन ही से राष्ट्र-जागरण के अभिलाषी थे।’’ (वही)
मनव एकता सचमुच पवित्रतम आदर्श है, देखने-सुनने में अच्छा लगता है, पर इसमें दोष यह है कि इसका आधार अमूर्त चिंतन है। लेकिन अमूर्त मानव का कहीं कोई अस्तित्व नहीं है। आज के युग में मानव पहले राष्ट्रों में और फिर राष्ट्रों के भीतर वर्गों में बंटा हुआ है। इस स्थिति में मानव एकता के मार्ग को उत्तम
वह विवेकानन्द का अभीष्ट न था क्योंकि इस विषय में वे गांधी के समान ही मानव-सेवा के प्रयोजन ही से राष्ट्र-जागरण के अभिलाषी थे।’’ (वही)
मनव एकता सचमुच पवित्रतम आदर्श है, देखने-सुनने में अच्छा लगता है, पर इसमें दोष यह है कि इसका आधार अमूर्त चिंतन है। लेकिन अमूर्त मानव का कहीं कोई अस्तित्व नहीं है। आज के युग में मानव पहले राष्ट्रों में और फिर राष्ट्रों के भीतर वर्गों में बंटा हुआ है। इस स्थिति में मानव एकता के मार्ग को उत्तम