नहीं हो सकता। जब स्आलिन से एक साक्षात्कार में एच. जी. वेल्स ने बड़े उत्साह में भरकर इस पवित्रतम आदर्श की व्याख्या की तो स्आलिन ने उसे ‘कूप-मंडूक’ की संज्ञा दी थी।
रोमां रोलां ने अपने इस चिंतन की असंगति के कारण ही विवेकानन्द और गांधी को आपस में गड्डमड्ड कर दिया। उन्होंने न सिर्फ गांधी को बल्कि विवेकानन्द को भी समझने में भूल की। अतएव वे अपने उक्त विश्लेषण को जारी रखते हुए आगे लिखते हैं:
‘‘इस पर भी विवेकानन्द जैसे व्यक्ति
नहीं हो सकता। जब स्आलिन से एक साक्षात्कार में एच. जी. वेल्स ने बड़े उत्साह में भरकर इस पवित्रतम आदर्श की व्याख्या की तो स्आलिन ने उसे ‘कूप-मंडूक’ की संज्ञा दी थी।
रोमां रोलां ने अपने इस चिंतन की असंगति के कारण ही विवेकानन्द और गांधी को आपस में गड्डमड्ड कर दिया। उन्होंने न सिर्फ गांधी को बल्कि विवेकानन्द को भी समझने में भूल की। अतएव वे अपने उक्त विश्लेषण को जारी रखते हुए आगे लिखते हैं:
‘‘इस पर भी विवेकानन्द जैसे व्यक्ति