सिर्फ दरिद्रनारायण की पूजा करो, यही तुम्हारा देवता है। दरिद्र अथवा उत्पीड़ित की पूजा अथवा सेवा एक बात है, पर उन्हें क्रान्ति की शक्ति के रूप में देखना और वर्गाधार पर संगठित करना एकदम दूसरी बात है जो विवेकानन्द सोच नहीं पाए और अपने उक्त वर्ग स्वभाव के कारण उनके लिए सोच पाना सम्भव भी नहीं था। ज़रूरत इस बात की थी कि उनके सिर के बल खड़े सिद्वान्त तो उसी प्रकार पांव के बल सीधा खड़ा किया जाता जिस प्रकार माक्र्स ने हेगल के सिद्वान्त
सिर्फ दरिद्रनारायण की पूजा करो, यही तुम्हारा देवता है। दरिद्र अथवा उत्पीड़ित की पूजा अथवा सेवा एक बात है, पर उन्हें क्रान्ति की शक्ति के रूप में देखना और वर्गाधार पर संगठित करना एकदम दूसरी बात है जो विवेकानन्द सोच नहीं पाए और अपने उक्त वर्ग स्वभाव के कारण उनके लिए सोच पाना सम्भव भी नहीं था। ज़रूरत इस बात की थी कि उनके सिर के बल खड़े सिद्वान्त तो उसी प्रकार पांव के बल सीधा खड़ा किया जाता जिस प्रकार माक्र्स ने हेगल के सिद्वान्त