को किया था। यह तभी सम्भव था जब उनके बाद कोई दूसरा विवेकानन्द पैदा हुआ होता, लेकिन नहीं हुआ उनके गुरू-भाई और शिष्य मध्यवर्ग से आए थे। वे विवेकानन्द को उनके जीवन ही में नहीं समझ पाए, बाद में क्या समझते। जिस प्रकार रोमां रोलां ने विवेकानन्द के धार्मिक पक्ष ही को देखा, उसी प्रकार इन लोगों ने भी सिर्फ धार्मिक पक्ष को देखा और राजनीतिक पक्ष की उपेक्षा की और अब भी कर रहे हैं। परिणाम यह कि विवेकानन्द ने जिस धर्मांधता के विरूद्व आजीवन संघर्ष किया
को किया था। यह तभी सम्भव था जब उनके बाद कोई दूसरा विवेकानन्द पैदा हुआ होता, लेकिन नहीं हुआ उनके गुरू-भाई और शिष्य मध्यवर्ग से आए थे। वे विवेकानन्द को उनके जीवन ही में नहीं समझ पाए, बाद में क्या समझते। जिस प्रकार रोमां रोलां ने विवेकानन्द के धार्मिक पक्ष ही को देखा, उसी प्रकार इन लोगों ने भी सिर्फ धार्मिक पक्ष को देखा और राजनीतिक पक्ष की उपेक्षा की और अब भी कर रहे हैं। परिणाम यह कि विवेकानन्द ने जिस धर्मांधता के विरूद्व आजीवन संघर्ष किया