के दौरान 1907 के सूरत अधिवेशन में उन्होंने इन राजभक्त दलाल तत्त्वों को जिनके नेता गोपालकृष्ण गोखले थे, कांगे्रस से निकाल बाहर किया और तभी आन्दोलन आगे बढ़ पाया। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी, क्यांेकि देशभक्तों और राजभक्तों में अलगाव के बिना विदेशी शासन के विरूद्व संघर्ष का सफल होना सम्भव नहीं था।
अब हुआ यह कि तिलक के नेतृत्व में जिन देशभक्त तत्त्वों ने जन-आन्दोलन को आगे बढ़ाया, उन्हें उग्रवादी की और जिन अंगे्रज़-भक्तों
के दौरान 1907 के सूरत अधिवेशन में उन्होंने इन राजभक्त दलाल तत्त्वों को जिनके नेता गोपालकृष्ण गोखले थे, कांगे्रस से निकाल बाहर किया और तभी आन्दोलन आगे बढ़ पाया। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी, क्यांेकि देशभक्तों और राजभक्तों में अलगाव के बिना विदेशी शासन के विरूद्व संघर्ष का सफल होना सम्भव नहीं था।
अब हुआ यह कि तिलक के नेतृत्व में जिन देशभक्त तत्त्वों ने जन-आन्दोलन को आगे बढ़ाया, उन्हें उग्रवादी की और जिन अंगे्रज़-भक्तों