को कांगे्रस से निकाला गया उन्हें माडरेट अथवा उदारवादी की संज्ञा दी गई। इसका प्रयोजन देशभक्त और अंगे्रज़-भक्त के बीच के अन्तर को मिटाने अर्थात् प्रगतिशील और प्रतिक्रियावादी तत्त्वों को आपस में गड्डमड्ड करने और दोनों को देशभक्त सिद्व करने के अतिरिक्त
215 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
और कुछ नहीं था। परिणाम यह कि घृणा के पात्रों को भी आदर तथा श्रद्वा के पात्र बना दिया गया।
हमारा स्वाधीनता-संग्राम जब गुप्त रूप से और खुले
को कांगे्रस से निकाला गया उन्हें माडरेट अथवा उदारवादी की संज्ञा दी गई। इसका प्रयोजन देशभक्त और अंगे्रज़-भक्त के बीच के अन्तर को मिटाने अर्थात् प्रगतिशील और प्रतिक्रियावादी तत्त्वों को आपस में गड्डमड्ड करने और दोनों को देशभक्त सिद्व करने के अतिरिक्त
215 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
और कुछ नहीं था। परिणाम यह कि घृणा के पात्रों को भी आदर तथा श्रद्वा के पात्र बना दिया गया।
हमारा स्वाधीनता-संग्राम जब गुप्त रूप से और खुले