तिलक भी विवेकानन्द की तरह भारतीय संस्कृति को समझने और उस पर गर्व करने वाले जनवादी नेता थे। उन्होंने ‘गीता-रहस्य’ नौजवानों को क्रान्ति की प्रेरणा देने के उद्देश्य से लिखा था। इसके विपरीत गांधी ने ‘गीता माता’ नाम से गीता की जो व्याख्या की उसका उद्देश्य निश्चित रूप से प्रतिक्रियावादी है, क्योंकि वह संघर्ष को अन्तर्मुखी बनाती है। मन्मथनाथ गुुप्त ने ‘वे अमर क्रांन्तिकारी पुस्तक की भूमिका में उसकी आलोचना यों की है:
‘‘यह
तिलक भी विवेकानन्द की तरह भारतीय संस्कृति को समझने और उस पर गर्व करने वाले जनवादी नेता थे। उन्होंने ‘गीता-रहस्य’ नौजवानों को क्रान्ति की प्रेरणा देने के उद्देश्य से लिखा था। इसके विपरीत गांधी ने ‘गीता माता’ नाम से गीता की जो व्याख्या की उसका उद्देश्य निश्चित रूप से प्रतिक्रियावादी है, क्योंकि वह संघर्ष को अन्तर्मुखी बनाती है। मन्मथनाथ गुुप्त ने ‘वे अमर क्रांन्तिकारी पुस्तक की भूमिका में उसकी आलोचना यों की है:
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