सदस्यों का मन प्रसन्न किया करता था। पर उपासना के विषय में वह दूसरे सदस्यों से सहमत नहीं था। उसे ब्रह्मसमाज में त्याग और धर्मनिष्ठा की कमी महसूस होती थी। नरेन्द्र जो कुछ देखता था, उसकी वह निर्भीक आलोचना करता था। उसका मन अब भी अशान्त था। और जिस जीते-जागते सत्य की उसे खोज थी, वह यहां भी दिखाई नहीं पड़ा। एक दिन देवेन्द्रनाथ ठाकुर ने उसे उपदेश देते हुए कहा ‘‘तुम्हारे अंग-प्रत्यंग में योगियों के चिहृ मौजूद हैं। ध्यान करने ही से तुम्हें शांति और सत्य की प्राप्ति होगी।’’
सदस्यों का मन प्रसन्न किया करता था। पर उपासना के विषय में वह दूसरे सदस्यों से सहमत नहीं था। उसे ब्रह्मसमाज में त्याग और धर्मनिष्ठा की कमी महसूस होती थी। नरेन्द्र जो कुछ देखता था, उसकी वह निर्भीक आलोचना करता था। उसका मन अब भी अशान्त था। और जिस जीते-जागते सत्य की उसे खोज थी, वह यहां भी दिखाई नहीं पड़ा। एक दिन देवेन्द्रनाथ ठाकुर ने उसे उपदेश देते हुए कहा ‘‘तुम्हारे अंग-प्रत्यंग में योगियों के चिहृ मौजूद हैं। ध्यान करने ही से तुम्हें शांति और सत्य की प्राप्ति होगी।’’