जो क्रान्ति की राह में रूकावट बनी हुई हैं। ज्यो-ज्यों वे क्रान्तिकारी विचारधारा को आत्मसात् करते जाएंगे उनके मन में देश की गुलामी का एहसास बढ़ता जाएगा और यह एहसास उनके मन में आज़ादी की ऐसी प्यास पैदा कर देगा, जो दासता की जं़जीरों को तोड़े बिना नहीं बुझ पाएगी। यह प्यास निरन्तर बढ़ती चली जाएगी। गुलामी के एहसास और आज़ादी की तड़प से उनका खून खौलेगा और वे आतताइयों को मौत के घाट
217 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
उतारने के लिए मैदान
जो क्रान्ति की राह में रूकावट बनी हुई हैं। ज्यो-ज्यों वे क्रान्तिकारी विचारधारा को आत्मसात् करते जाएंगे उनके मन में देश की गुलामी का एहसास बढ़ता जाएगा और यह एहसास उनके मन में आज़ादी की ऐसी प्यास पैदा कर देगा, जो दासता की जं़जीरों को तोड़े बिना नहीं बुझ पाएगी। यह प्यास निरन्तर बढ़ती चली जाएगी। गुलामी के एहसास और आज़ादी की तड़प से उनका खून खौलेगा और वे आतताइयों को मौत के घाट
217 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
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