निर्मम हिंसा थी। क्राान्ति को विफल बनाने अथवा स्थगित करने का भयंकर परिणाम हमारे सामने है। सत्य और अहिंसा के नाम पर धोखा-धड़ी, लूट-खसोट और भ्रष्टाचार का बाज़ार गर्म है। प्रत्येक राज्य में दर्जनों ढोंगी और पांखडी ‘अवतार’ पैदा हो गए है। साल के अन्त में विश्व-बंधुत्व तथा मानव सम्मेलनों की बाढ़-सी आ जाती है। बड़े-बड़े जुलूस निकलते हैं, बड़े-बडे़ जलसे होते हैं। और इन तथाकथित अवतारों को बड़े-बड़े नेताओं तथा राजपुरूषों का सहयोग सहज प्राप्त
निर्मम हिंसा थी। क्राान्ति को विफल बनाने अथवा स्थगित करने का भयंकर परिणाम हमारे सामने है। सत्य और अहिंसा के नाम पर धोखा-धड़ी, लूट-खसोट और भ्रष्टाचार का बाज़ार गर्म है। प्रत्येक राज्य में दर्जनों ढोंगी और पांखडी ‘अवतार’ पैदा हो गए है। साल के अन्त में विश्व-बंधुत्व तथा मानव सम्मेलनों की बाढ़-सी आ जाती है। बड़े-बड़े जुलूस निकलते हैं, बड़े-बडे़ जलसे होते हैं। और इन तथाकथित अवतारों को बड़े-बड़े नेताओं तथा राजपुरूषों का सहयोग सहज प्राप्त