हो जाता है। देशी-विदेशी निहित स्वार्थ इन सम्मेलनों और जलसे-जुलूसों पर अपना काला धन दिल खोलकर खर्च करते हैं। पर जब देश की भूखी जनता रोटी मांगती है तो उस पर गोलियां दागी जाती हैं।
भगतसिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद ने हिन्दुस्तान ‘सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ नाम से जब अपना दल संगठित किया तो आतंकवाद सामूहिक क्रान्ति के चरण में प्रवेश कर रहा था और इस दल का माक्र्स की क्रान्तिकारी विचारधारा से संबंध जुड़ गया था। माक्र्सवाद से संबंध
हो जाता है। देशी-विदेशी निहित स्वार्थ इन सम्मेलनों और जलसे-जुलूसों पर अपना काला धन दिल खोलकर खर्च करते हैं। पर जब देश की भूखी जनता रोटी मांगती है तो उस पर गोलियां दागी जाती हैं।
भगतसिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद ने हिन्दुस्तान ‘सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ नाम से जब अपना दल संगठित किया तो आतंकवाद सामूहिक क्रान्ति के चरण में प्रवेश कर रहा था और इस दल का माक्र्स की क्रान्तिकारी विचारधारा से संबंध जुड़ गया था। माक्र्सवाद से संबंध