‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोंस्तां’ लिखकर प्रसिद्वि पाई वहां चैथे दशके में ‘उठो, मेरी दुनिया के गरीबों को जगा दो’ लिखकर बामपक्षियों में विशेष महत्त्व प्राप्त किया। लेकिन इकबाल अब दुनिया ही की बात करते थे और इस्लामी भ्रातत्व (च्ंद प्ेसंउपेउ) की बात करते थे। वतन की-देश की बात करना गुनाह समझते थे। उनकी एक कविता ‘वतनीय्यत’ (राष्ट्रवाद) है। वे कहते हैं:
इन ताजा खुदाओं में बड़ा सबसे वतन है
जो पैरहन उसका है वह मज़हब का कफन है।
‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोंस्तां’ लिखकर प्रसिद्वि पाई वहां चैथे दशके में ‘उठो, मेरी दुनिया के गरीबों को जगा दो’ लिखकर बामपक्षियों में विशेष महत्त्व प्राप्त किया। लेकिन इकबाल अब दुनिया ही की बात करते थे और इस्लामी भ्रातत्व (च्ंद प्ेसंउपेउ) की बात करते थे। वतन की-देश की बात करना गुनाह समझते थे। उनकी एक कविता ‘वतनीय्यत’ (राष्ट्रवाद) है। वे कहते हैं:
इन ताजा खुदाओं में बड़ा सबसे वतन है
जो पैरहन उसका है वह मज़हब का कफन है।