औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली ने ऐसे त्रिशंकुओं को एक बड़ी तायदाद पैदा कर दी है, जिनके पांव देश की धरती पर नहीं हैं, जो भारत को अपना देश नहीं समझते और भारत की जनता से जिनका कोई तादात्म्य नहंीं है। ऐसी पुस्तकें ऐसे ही लोगों के लिए लिखी जाती हैं और वही उन्हें पढ़ते हैं। इन तथाकथित वामपंथियें के पास न भाषा है और न विचार है। परिणाम यह कि पिछले सत्तर वर्ष के आन्दोलन में हमारे इतिहास, दर्शन संस्कृति में उनका कोई स्थान नहीं है।
औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली ने ऐसे त्रिशंकुओं को एक बड़ी तायदाद पैदा कर दी है, जिनके पांव देश की धरती पर नहीं हैं, जो भारत को अपना देश नहीं समझते और भारत की जनता से जिनका कोई तादात्म्य नहंीं है। ऐसी पुस्तकें ऐसे ही लोगों के लिए लिखी जाती हैं और वही उन्हें पढ़ते हैं। इन तथाकथित वामपंथियें के पास न भाषा है और न विचार है। परिणाम यह कि पिछले सत्तर वर्ष के आन्दोलन में हमारे इतिहास, दर्शन संस्कृति में उनका कोई स्थान नहीं है।