योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

संगीत आदि की चर्चा करने के बाद शेष समय साधना-भजन में बिताता था। सत्येन्द्रनाथ मजूमदार अपनी ‘विवेकानन्द-चरित’ पुस्तक में लिखते हैंः

‘‘इस प्रकार दिन पर दिन बीतते गये, पर सत्य को जानने की उनकी इच्छा तृप्त तो हुई नहीं, अपितु अधिकाधिक बढ़ने लगी। धीरे-धीरे उन्होंने समझा कि अतींद्रिय सत्य को प्रत्यक्ष करने के लिए एक ऐसे व्यक्ति के चरणों के पास बैठकर शिक्षा-लाभ करना आवश्यक है, जिसने स्वयं उस सत्य का साक्षात्कार किया है। उन्होंने


111 of 1197

संगीत आदि की चर्चा करने के बाद शेष समय साधना-भजन में बिताता था। सत्येन्द्रनाथ मजूमदार अपनी ‘विवेकानन्द-चरित’ पुस्तक में लिखते हैंः

‘‘इस प्रकार दिन पर दिन बीतते गये, पर सत्य को जानने की उनकी इच्छा तृप्त तो हुई नहीं, अपितु अधिकाधिक बढ़ने लगी। धीरे-धीरे उन्होंने समझा कि अतींद्रिय सत्य को प्रत्यक्ष करने के लिए एक ऐसे व्यक्ति के चरणों के पास बैठकर शिक्षा-लाभ करना आवश्यक है, जिसने स्वयं उस सत्य का साक्षात्कार किया है। उन्होंने


111 of 1197