कहने वाले आंग्लीकृत सुधारक न सिर्फ यह कि राष्ट्रीय संघर्ष से अलग रहे बल्कि उनमें से बहुतों ने राष्ट्र-विरोधी और जन-विरोधी भूमिका अदा की। 1930 के बाद समाजवाद और प्रगतिशील नेताओं तथा लेखकों की भूमिका भी आज किसी से छिपी नहीं। दरअसल राष्ट्र को नकारकर अंतर्राष्ट्रीय बनने वाले इन तथाकथित बामपक्षियों ने अतीत की हर शै को हेय समझने वाली परम्परा विरोधी और समाज-विरोधी प्रवत्ति ही को अधिक बढ़ाया-फेलाया। इससे दलाल-तत्त्वों ही का पोषण हुआ।
कहने वाले आंग्लीकृत सुधारक न सिर्फ यह कि राष्ट्रीय संघर्ष से अलग रहे बल्कि उनमें से बहुतों ने राष्ट्र-विरोधी और जन-विरोधी भूमिका अदा की। 1930 के बाद समाजवाद और प्रगतिशील नेताओं तथा लेखकों की भूमिका भी आज किसी से छिपी नहीं। दरअसल राष्ट्र को नकारकर अंतर्राष्ट्रीय बनने वाले इन तथाकथित बामपक्षियों ने अतीत की हर शै को हेय समझने वाली परम्परा विरोधी और समाज-विरोधी प्रवत्ति ही को अधिक बढ़ाया-फेलाया। इससे दलाल-तत्त्वों ही का पोषण हुआ।