आज देश में क्रान्ति की परिस्थिति पहले की अपेक्षा कहीं अधिक परिपक्व है। जनता क्रान्ति के लिए तैयार है। पर उसकी रहनुमाई करने वाली क्रान्तिकारी पार्टी अभी सामने नहीं। राष्ट्रीयता को नकारना ही इस अभाव का मुख्य कारण है। हमारी अपढ़ और दरिद्र सदियों के अनुभव को अपनी झोली में प्राणपन से सम्भाले हुए हैं। उसके हाथ चाहे खुरदरे और घायल है, क्यांेकि कठिन श्रम किया है और उन पर क्रूर प्रहार होते रहे हैं, पर वह झोली को मज़बूती से पकड़े
आज देश में क्रान्ति की परिस्थिति पहले की अपेक्षा कहीं अधिक परिपक्व है। जनता क्रान्ति के लिए तैयार है। पर उसकी रहनुमाई करने वाली क्रान्तिकारी पार्टी अभी सामने नहीं। राष्ट्रीयता को नकारना ही इस अभाव का मुख्य कारण है। हमारी अपढ़ और दरिद्र सदियों के अनुभव को अपनी झोली में प्राणपन से सम्भाले हुए हैं। उसके हाथ चाहे खुरदरे और घायल है, क्यांेकि कठिन श्रम किया है और उन पर क्रूर प्रहार होते रहे हैं, पर वह झोली को मज़बूती से पकड़े