और थामे हुए हैं। यह अपढ़ और दरिद्र जनता क्रान्ति का नेतृत्व उसी पार्टी को सौंपेगी, जो उसकी झोली के अनुभव को आदर से देखे-परखेगी। दरअसल वह पार्टी भी क्रान्तिकारी तभी बन पाएगी और तभी जनता से उनका तादात्म्य स्थापित होगा। यह मुमकिन नहीं कि अतीत तो प्रतिक्रियावादियों के लिए छोड़ दिया जाए और भविष्य के मालिक क्रान्तिकारी शक्ति का अभाव नहीं। कठोरपनिषद् का यह उद्घोष-‘उठो, जागो और तब तक आगे बढ़ते चलो जब तक कि अपने ध्येय को प्राप्त न कर लो’-हमेशा उसके खून को गरमाता रहा है।
और थामे हुए हैं। यह अपढ़ और दरिद्र जनता क्रान्ति का नेतृत्व उसी पार्टी को सौंपेगी, जो उसकी झोली के अनुभव को आदर से देखे-परखेगी। दरअसल वह पार्टी भी क्रान्तिकारी तभी बन पाएगी और तभी जनता से उनका तादात्म्य स्थापित होगा। यह मुमकिन नहीं कि अतीत तो प्रतिक्रियावादियों के लिए छोड़ दिया जाए और भविष्य के मालिक क्रान्तिकारी शक्ति का अभाव नहीं। कठोरपनिषद् का यह उद्घोष-‘उठो, जागो और तब तक आगे बढ़ते चलो जब तक कि अपने ध्येय को प्राप्त न कर लो’-हमेशा उसके खून को गरमाता रहा है।