मज़दूर, किसान, विद्यार्थी तथा देश की समूची मेहनतकश जनता अब जाग उठी है और पिछले चालिस पैंतालिस बरस के अनुभव से उसने भली-भांति समझ लिया है कि सशस्त्र क्रान्ति के बिना नये भारत का स्वप्न साकार नहीं होगा। और उनका नेतृत्व करने वालों को भी समझ लेना होगा कि पार्टी जनता से बड़ी नहीं, बल्कि जनता पार्टी से बड़ी है और इस समझ को व्यावहारिक रूप देना होगा।
भाषा, साहित्य और कला पर विवेकानन्द के विचार
‘‘कला सौंदर्य की अभिव्यक्ति है। प्रत्येक वस्तु कला पूर्ण होनी चाहिए।’’
मज़दूर, किसान, विद्यार्थी तथा देश की समूची मेहनतकश जनता अब जाग उठी है और पिछले चालिस पैंतालिस बरस के अनुभव से उसने भली-भांति समझ लिया है कि सशस्त्र क्रान्ति के बिना नये भारत का स्वप्न साकार नहीं होगा। और उनका नेतृत्व करने वालों को भी समझ लेना होगा कि पार्टी जनता से बड़ी नहीं, बल्कि जनता पार्टी से बड़ी है और इस समझ को व्यावहारिक रूप देना होगा।
भाषा, साहित्य और कला पर विवेकानन्द के विचार
‘‘कला सौंदर्य की अभिव्यक्ति है। प्रत्येक वस्तु कला पूर्ण होनी चाहिए।’’