अंगे्रज़ी पर उनके अधिकार और विद्वता की बड़ी तारीफ की। लेकिन इस तारीफ के बावजूद उन्होंने अपनी अंगे्रज़ी पर कभी गर्व नहीं किया। 29 जुलाई, 1897 को वे अल्मोड़ा से स्वामी रामकृष्ण को लिखते हैं:
‘‘कल यहां पर अंगे्रज़ लोगों के बीच एक व्याख्यान हुआ, उससे सब लोग अत्यन्त आनंदित हुए हैं। किन्तु उससे पूर्व दिवस हिन्दी में मेरा भाषण हुआ, उससे मैं अत्यंत आनंदित हूं-मुझे पहले ऐसी धारणा नहीं थी कि हिंदी मंे भी मैं वक्तृता दे सकूंगा।’’ अगले
अंगे्रज़ी पर उनके अधिकार और विद्वता की बड़ी तारीफ की। लेकिन इस तारीफ के बावजूद उन्होंने अपनी अंगे्रज़ी पर कभी गर्व नहीं किया। 29 जुलाई, 1897 को वे अल्मोड़ा से स्वामी रामकृष्ण को लिखते हैं:
‘‘कल यहां पर अंगे्रज़ लोगों के बीच एक व्याख्यान हुआ, उससे सब लोग अत्यन्त आनंदित हुए हैं। किन्तु उससे पूर्व दिवस हिन्दी में मेरा भाषण हुआ, उससे मैं अत्यंत आनंदित हूं-मुझे पहले ऐसी धारणा नहीं थी कि हिंदी मंे भी मैं वक्तृता दे सकूंगा।’’ अगले