योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

दिन 30 जुलाई को स्वामी अखंडानंद के नाम फिर लिखते हैं, ‘‘यहां पर साहबों के बीच मैंने एक अंगे्रज़ी भाषण तथा भारतीयों के लिए एक भाषण हिंदी में दिया था। हिंदी में यह मेरा प्रथम भाषण था- किन्तु सभी ने बहुत पसंद किया। साहब लोग तो जैसे हैं वैसे ही हैं, चारों ओर यह सुनाई दिया ‘काला आदमी’, भाई, बहुत आश्चर्य की बात है।’’ (षष्ठ खंड, पृष्ठ 63-64)

विदेशियों की तारीफ का विवेकानन्द की दृष्टि में कुछ भी मूल्य नहीं था। वे इस तथ्य को


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दिन 30 जुलाई को स्वामी अखंडानंद के नाम फिर लिखते हैं, ‘‘यहां पर साहबों के बीच मैंने एक अंगे्रज़ी भाषण तथा भारतीयों के लिए एक भाषण हिंदी में दिया था। हिंदी में यह मेरा प्रथम भाषण था- किन्तु सभी ने बहुत पसंद किया। साहब लोग तो जैसे हैं वैसे ही हैं, चारों ओर यह सुनाई दिया ‘काला आदमी’, भाई, बहुत आश्चर्य की बात है।’’ (षष्ठ खंड, पृष्ठ 63-64)

विदेशियों की तारीफ का विवेकानन्द की दृष्टि में कुछ भी मूल्य नहीं था। वे इस तथ्य को


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