वह संस्कृत है। अतएव हमारे राष्ट्रीय जीवन में संस्कृत का जो महत्त्व है उसे विवेकानन्द ने समझा और देशवासियों को समझाने का प्रयत्न किया। वह अपने उक्त भाषण में कहते हैं:
‘‘मेरा विचार है, पहले हमारे शास्त्र गं्रथों में भरे पड़े आध्यात्मिकता के रत्नों को जो कुछ ही मनुष्यों के अधिकार में मठों और अरण्यों में छिपे हुए हैं, बाहर लाना है। जिन लोगों के अधिकार में यह छिपे हुए हैं, केवल उन्हीं से इस ज्ञान का उद्वार करना नहीं, वरन्
वह संस्कृत है। अतएव हमारे राष्ट्रीय जीवन में संस्कृत का जो महत्त्व है उसे विवेकानन्द ने समझा और देशवासियों को समझाने का प्रयत्न किया। वह अपने उक्त भाषण में कहते हैं:
‘‘मेरा विचार है, पहले हमारे शास्त्र गं्रथों में भरे पड़े आध्यात्मिकता के रत्नों को जो कुछ ही मनुष्यों के अधिकार में मठों और अरण्यों में छिपे हुए हैं, बाहर लाना है। जिन लोगों के अधिकार में यह छिपे हुए हैं, केवल उन्हीं से इस ज्ञान का उद्वार करना नहीं, वरन्