उससे भी दुष्टों दुभु दुर्भद्य पटिका अर्थात् जिस भाषा में यह सुरक्षित है, उन शताब्दियों के पर्त खाये हुए संस्कृत शब्दों से उन्हें निकालना होगा। तात्पर्य यह है कि मैं उन्हें सबके लिए सुलभ करना चाहता हूं, मैं इन रतनों को निकाल कर सबकी, भारत के प्रत्येक मनुष्य की, सामान्य सम्पत्ति बनाना चाहता हूं चाहे वह संस्कृत जानता हो या नहीं। इस मार्ग की बहुत बड़ी कठिनाई हमारी गौरवशाली भाषा संस्कृत ही है, यह कठिनाई तब तक दूर नहीं हो सकती,
उससे भी दुष्टों दुभु दुर्भद्य पटिका अर्थात् जिस भाषा में यह सुरक्षित है, उन शताब्दियों के पर्त खाये हुए संस्कृत शब्दों से उन्हें निकालना होगा। तात्पर्य यह है कि मैं उन्हें सबके लिए सुलभ करना चाहता हूं, मैं इन रतनों को निकाल कर सबकी, भारत के प्रत्येक मनुष्य की, सामान्य सम्पत्ति बनाना चाहता हूं चाहे वह संस्कृत जानता हो या नहीं। इस मार्ग की बहुत बड़ी कठिनाई हमारी गौरवशाली भाषा संस्कृत ही है, यह कठिनाई तब तक दूर नहीं हो सकती,