थे। पहले यह बात हमें याद करनी होगी। हमें समझना होगा कि हम किन उपादानों से बने हैं, कौन-सा खून हमारी नसों में बह रहा है। और अतीत के उसके कृतित्व पर भी, इस विश्वास और अतीत गौरव के ज्ञान से हम अवश्य एक ऐसे भारत की नींव डालंेगे, जो पहले से श्रेष्ठ होगा।’’ (वही, पृष्ठ 179-80)
संस्कृत पढ़ने से अभिप्राय यह है कि संस्कृत साहित्य में जो कुछ छिपा पड़ा है, जन-साधारण के लिए उसे उनकी भाषा में उपलब्ध बनाया जाये, जैसा कि विवेकानन्द
थे। पहले यह बात हमें याद करनी होगी। हमें समझना होगा कि हम किन उपादानों से बने हैं, कौन-सा खून हमारी नसों में बह रहा है। और अतीत के उसके कृतित्व पर भी, इस विश्वास और अतीत गौरव के ज्ञान से हम अवश्य एक ऐसे भारत की नींव डालंेगे, जो पहले से श्रेष्ठ होगा।’’ (वही, पृष्ठ 179-80)
संस्कृत पढ़ने से अभिप्राय यह है कि संस्कृत साहित्य में जो कुछ छिपा पड़ा है, जन-साधारण के लिए उसे उनकी भाषा में उपलब्ध बनाया जाये, जैसा कि विवेकानन्द