वह ‘मेघनाद-वध’, काव्य लिख गया। पर इससे हुआ क्या? करता रहे जो कोई जो कुछ चाहे। वहीं ‘मेघनाद-वध’ काव्य अब हिमालय की तरह अटल होकर खड़ा है, परन्तु उसमें दोष निकालने में जो लोग व्यस्त थे, उन सब समालोचकों के मत और लेख अब न जाने कहां बह गये ? मायकेल नवीन छंद और ओजपूर्ण भाषा में जिस काव्य की रचना कर गये, उसे साधारण लोग क्या समझेगे ? इसी प्र्रकार यदि जो जी.सी. उसकी परवा करता है ? समय आने पर ही सब लोग उन पुस्तकों का मूल्य समझेंगे।
वह ‘मेघनाद-वध’, काव्य लिख गया। पर इससे हुआ क्या? करता रहे जो कोई जो कुछ चाहे। वहीं ‘मेघनाद-वध’ काव्य अब हिमालय की तरह अटल होकर खड़ा है, परन्तु उसमें दोष निकालने में जो लोग व्यस्त थे, उन सब समालोचकों के मत और लेख अब न जाने कहां बह गये ? मायकेल नवीन छंद और ओजपूर्ण भाषा में जिस काव्य की रचना कर गये, उसे साधारण लोग क्या समझेगे ? इसी प्र्रकार यदि जो जी.सी. उसकी परवा करता है ? समय आने पर ही सब लोग उन पुस्तकों का मूल्य समझेंगे।