योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

पर मैं अपना कत्र्तव्य नहीं भूल सकता, फिर दुनिया रहे या जाये-यही है महावीर का वाक्य। मायकेल ने इसी भाव से अणुप्राण्ति होकर काव्य के उस अंश को लिखा था।’’ (पृष्ठ खंड, पृष्ठ 190-91)

स्वामीजी खुद भी नए विचारों और नई भावनाओं के प्रतिनिधि थे। उन्होंने भी बंगला भाषा में नया प्रयोग किया तो उनका भी विरोध हुआ, शिष्यों तक ने आपत्ति की। इसी ‘वार्ता एवं संलाप’ मंे उन्होंने अपने दृष्टिकोण की जो व्याख्या की, उससे भाषा और विचार का,


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पर मैं अपना कत्र्तव्य नहीं भूल सकता, फिर दुनिया रहे या जाये-यही है महावीर का वाक्य। मायकेल ने इसी भाव से अणुप्राण्ति होकर काव्य के उस अंश को लिखा था।’’ (पृष्ठ खंड, पृष्ठ 190-91)

स्वामीजी खुद भी नए विचारों और नई भावनाओं के प्रतिनिधि थे। उन्होंने भी बंगला भाषा में नया प्रयोग किया तो उनका भी विरोध हुआ, शिष्यों तक ने आपत्ति की। इसी ‘वार्ता एवं संलाप’ मंे उन्होंने अपने दृष्टिकोण की जो व्याख्या की, उससे भाषा और विचार का,


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