नवीन प्रतिभा की मुहर लगाकर सब विषयों का प्रचार करना पड़ेगा। देखो न, संन्यासियों की प्राचीन चाल-ढाल टूटकर अब क्रमशः कैसी नवीन परिपाटी बन रही है। इसके विरूद्व समाज में भी बहुत कुछ प्रतिवाद हो रहा है, परन्तु इससे क्या ? क्या हम उससे डरें ? आजकल इन संन्यासियों को प्रचार-कार्य के निमित्त दूर-दूर जाना है। यदी प्राचीन संन्यासियों का वेश धारण कर अर्थात् भस्म लगाकर और अद्र्वनग्न होकर वे कहीं विदेश को जाना चाहें तो पहले तो जहाज
नवीन प्रतिभा की मुहर लगाकर सब विषयों का प्रचार करना पड़ेगा। देखो न, संन्यासियों की प्राचीन चाल-ढाल टूटकर अब क्रमशः कैसी नवीन परिपाटी बन रही है। इसके विरूद्व समाज में भी बहुत कुछ प्रतिवाद हो रहा है, परन्तु इससे क्या ? क्या हम उससे डरें ? आजकल इन संन्यासियों को प्रचार-कार्य के निमित्त दूर-दूर जाना है। यदी प्राचीन संन्यासियों का वेश धारण कर अर्थात् भस्म लगाकर और अद्र्वनग्न होकर वे कहीं विदेश को जाना चाहें तो पहले तो जहाज