नहीं दी सकती । जिनका किसी भाषा पर अच्छा अधिकार है, वे भावभिव्यक्ति रोककर नहीं चलते। दाल-भात का भोजन
228 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
करके तुम लोगों का शरीर जैसा दुर्बल हो गया है भाषा भी ठीक वैसी ही हो गई है। खान-पान, चाल-चलन, भाव-भाषा सबमें तेजस्विता लानी होगी। चारों ओर प्राण का संचार करना होगा, नस-नस में रक्त, का प्रवाह तेज करना होगा, जिससे सब विषयों में प्राणों का स्पंदन अनुभव हो, तभी इस घोर जीवन-संग्राम में देश के
नहीं दी सकती । जिनका किसी भाषा पर अच्छा अधिकार है, वे भावभिव्यक्ति रोककर नहीं चलते। दाल-भात का भोजन
228 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
करके तुम लोगों का शरीर जैसा दुर्बल हो गया है भाषा भी ठीक वैसी ही हो गई है। खान-पान, चाल-चलन, भाव-भाषा सबमें तेजस्विता लानी होगी। चारों ओर प्राण का संचार करना होगा, नस-नस में रक्त, का प्रवाह तेज करना होगा, जिससे सब विषयों में प्राणों का स्पंदन अनुभव हो, तभी इस घोर जीवन-संग्राम में देश के