हों, उज्जवल कांचन के अथवा क्षुद्र धातु के मलान,
पे्रम-घृणा, सह-असह सभी ये द्वन्द्वों से संघात,
दास सदा ही दास, समादृत व ताडित-परतंत्र
स्वर्ण निगड़ होने से क्या वे सुदृढ़ न बंधन यंत्र,
अतः उन्हें संन्यासी तोड़ो, छिन्न करो, गया यह मंत्र, ओम तत्सत्!
अंधकार हो दूर-ज्योति-छल जल-बुझ बारम्बार,
दृष्टि भ्रमित करता, तह पर तह मोह तमस विस्तार!
मिटे अजस, तृषा जीवन की, जो आवागमन द्वार,
विश्वजयी वह आत्मजयी जो, मानो इसे प्रमाण, ओम तत्सत् ओम !
हों, उज्जवल कांचन के अथवा क्षुद्र धातु के मलान,
पे्रम-घृणा, सह-असह सभी ये द्वन्द्वों से संघात,
दास सदा ही दास, समादृत व ताडित-परतंत्र
स्वर्ण निगड़ होने से क्या वे सुदृढ़ न बंधन यंत्र,
अतः उन्हें संन्यासी तोड़ो, छिन्न करो, गया यह मंत्र, ओम तत्सत्!
अंधकार हो दूर-ज्योति-छल जल-बुझ बारम्बार,
दृष्टि भ्रमित करता, तह पर तह मोह तमस विस्तार!
मिटे अजस, तृषा जीवन की, जो आवागमन द्वार,
विश्वजयी वह आत्मजयी जो, मानो इसे प्रमाण, ओम तत्सत् ओम !