योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand



‘बोओग, पाओगे, निश्चित कार्य-कारण-विधान !

कहते ‘शुभ का शुभ औ’ अशुभ का फल, श्रीमान्

दुर्निवार यह नियम, जीव के नाम-रूप् परिधान

बंधन है, सब है, पर दोनों नाम रूप के पार

नित्य मुक्त आत्मा करती है बंधनहीन विहार ।

तुम वह आत्मा को संन्यासी, बोलो वीर उदार, ओम सत्सत् ओम ।।

स्वामी जी उन दिनों अपने अमेरिकी शिष्यों को वेदान्त पढ़ा रहे थे और वही वेदान्त दर्शन इस कविता का आधार है। कवि आत्मा से कह रहा है कि जंजीर लोहे की हो,


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‘बोओग, पाओगे, निश्चित कार्य-कारण-विधान !

कहते ‘शुभ का शुभ औ’ अशुभ का फल, श्रीमान्

दुर्निवार यह नियम, जीव के नाम-रूप् परिधान

बंधन है, सब है, पर दोनों नाम रूप के पार

नित्य मुक्त आत्मा करती है बंधनहीन विहार ।

तुम वह आत्मा को संन्यासी, बोलो वीर उदार, ओम सत्सत् ओम ।।

स्वामी जी उन दिनों अपने अमेरिकी शिष्यों को वेदान्त पढ़ा रहे थे और वही वेदान्त दर्शन इस कविता का आधार है। कवि आत्मा से कह रहा है कि जंजीर लोहे की हो,


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