सोने की हो अथवा किसी और धातु की, आखिर जंजीर है। आत्मा उसे तोड़कर अपने को माया बंधन से मुक्त करे और नामरूप से परे चली जाये। यही
229 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
उसकी स्वाधीनता है।
वे वेदान्त दर्शन के जिस सिद्वान्त को मानते थे, उसे व्यवहार में भी लाते थे। ‘भारतीय जीवन में वेदान्त का प्रभाव’ भाषण में इस सिद्वान्त द्वारा साहित्य की आलोचना इस प्रकार की है:
‘‘उदाहरण स्वरूप मिल्टन, दान्ते, होमर अथवा अन्य किसी पाश्चात्य
सोने की हो अथवा किसी और धातु की, आखिर जंजीर है। आत्मा उसे तोड़कर अपने को माया बंधन से मुक्त करे और नामरूप से परे चली जाये। यही
229 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
उसकी स्वाधीनता है।
वे वेदान्त दर्शन के जिस सिद्वान्त को मानते थे, उसे व्यवहार में भी लाते थे। ‘भारतीय जीवन में वेदान्त का प्रभाव’ भाषण में इस सिद्वान्त द्वारा साहित्य की आलोचना इस प्रकार की है:
‘‘उदाहरण स्वरूप मिल्टन, दान्ते, होमर अथवा अन्य किसी पाश्चात्य