योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

कवि को लिया जा सकता है। उनके काव्यों में स्थान-स्थान पर उदात्त भावव्यंजक अपूर्वस्थल है, किन्तु उनमें सर्वत्र ही बाह्य प्रकृति की अनन्तता को इंद्रियों के माध्यम से ग्रहण करने की चेष्टा है, देश की अनन्तता के आदर्श को प्राप्त करने का प्रयत्न है। हम वेदों के संहिता भाग में भी यही श्रेष्ठ चेष्टा देखते हैं। कुछ अपूर्व ऋचाओं में जहां सृष्टि का वर्णन है, बाह्य प्रकृति प्रकाशित करने में असमर्थ हैं। तब उन्होंने जगत-समस्या की व्याख्या


1155 of 1197

कवि को लिया जा सकता है। उनके काव्यों में स्थान-स्थान पर उदात्त भावव्यंजक अपूर्वस्थल है, किन्तु उनमें सर्वत्र ही बाह्य प्रकृति की अनन्तता को इंद्रियों के माध्यम से ग्रहण करने की चेष्टा है, देश की अनन्तता के आदर्श को प्राप्त करने का प्रयत्न है। हम वेदों के संहिता भाग में भी यही श्रेष्ठ चेष्टा देखते हैं। कुछ अपूर्व ऋचाओं में जहां सृष्टि का वर्णन है, बाह्य प्रकृति प्रकाशित करने में असमर्थ हैं। तब उन्होंने जगत-समस्या की व्याख्या


1155 of 1197