के लिए अन्य मार्गों का अवलम्बन किया। उपनिषदों की भाषा ने नया रूप धारण किया, उपनिषदों की भाषा एक प्रकार से ‘नेति’ वाचक है, स्थान-स्थान पर अस्फुट है, मानो तुम्हें अतींद्रिय राज्य में ले जाने की चेष्टा करती है, केवल तुम्हें एक ऐसी वस्तु दिखा देती है, जिसे तुम ग्रहण नहीं कर सकते, जिसका तुम इंद्रियांे से बोध नहीं कर पाते, फिर भी उस वस्तु के संबंध में तुमको साथ ही यह निश्चय भी है कि उसका अस्तित्व है।’’ (पंचम खंड, पृष्ठ 130)
के लिए अन्य मार्गों का अवलम्बन किया। उपनिषदों की भाषा ने नया रूप धारण किया, उपनिषदों की भाषा एक प्रकार से ‘नेति’ वाचक है, स्थान-स्थान पर अस्फुट है, मानो तुम्हें अतींद्रिय राज्य में ले जाने की चेष्टा करती है, केवल तुम्हें एक ऐसी वस्तु दिखा देती है, जिसे तुम ग्रहण नहीं कर सकते, जिसका तुम इंद्रियांे से बोध नहीं कर पाते, फिर भी उस वस्तु के संबंध में तुमको साथ ही यह निश्चय भी है कि उसका अस्तित्व है।’’ (पंचम खंड, पृष्ठ 130)