योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

वे यह समझ रखें कि बिना दार्शनिक आधार के अच्छे काव्य और अच्छे साहित्य की सृष्टि सम्भव नहीं। सिद्वान्त चूंकि व्यक्तियों के नहीं वर्गों के होते हैं, इसलिए साहित्य और कला का भी वर्ग-चरित्र होता है।

और उनकी एक कविता है ‘जागृत देवता’ इसमें भी वेदान्त दर्शन ओत-प्रोत है। पूरी की पूरी कविता इस प्रकार है:

230 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

वह, जो तुममें है और तुमसे परे भी,

जो सबके हाथों में बैठकर काम करता है,

जो सबके पैरों में समाया हुआ चलता है,


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वे यह समझ रखें कि बिना दार्शनिक आधार के अच्छे काव्य और अच्छे साहित्य की सृष्टि सम्भव नहीं। सिद्वान्त चूंकि व्यक्तियों के नहीं वर्गों के होते हैं, इसलिए साहित्य और कला का भी वर्ग-चरित्र होता है।

और उनकी एक कविता है ‘जागृत देवता’ इसमें भी वेदान्त दर्शन ओत-प्रोत है। पूरी की पूरी कविता इस प्रकार है:

230 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

वह, जो तुममें है और तुमसे परे भी,

जो सबके हाथों में बैठकर काम करता है,

जो सबके पैरों में समाया हुआ चलता है,


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