अनुसार जब गाना समाप्त हुआ तो वह उसे हाथ पकड़कर एकान्त में ले गए और भीतर से कमरा बंद करके
30 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
बोले, ‘‘अरे तू इतने दिन कहां रहा? मैं कब से तेरी बाट जोह रहा हूं। विषयी लोगों के साथ बात करते-करते मेरा मुंह जल गया। आज तेरे समान सच्चे त्यागी के साथ बात करके मुझे शान्ति मिलेगी।’’ यह कहते-कहते उनकी आंखों में आंसू बह निकले। नरेन्द्र हत्बुद्वि-सा उनकी ओर ताकता रहा।
देखते ही देखते रामकृष्ण परमहंस ने हाथ जोड़कर नरेन्द्र को सम्मान से सम्बोधित किया,
अनुसार जब गाना समाप्त हुआ तो वह उसे हाथ पकड़कर एकान्त में ले गए और भीतर से कमरा बंद करके
30 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
बोले, ‘‘अरे तू इतने दिन कहां रहा? मैं कब से तेरी बाट जोह रहा हूं। विषयी लोगों के साथ बात करते-करते मेरा मुंह जल गया। आज तेरे समान सच्चे त्यागी के साथ बात करके मुझे शान्ति मिलेगी।’’ यह कहते-कहते उनकी आंखों में आंसू बह निकले। नरेन्द्र हत्बुद्वि-सा उनकी ओर ताकता रहा।
देखते ही देखते रामकृष्ण परमहंस ने हाथ जोड़कर नरेन्द्र को सम्मान से सम्बोधित किया,