‘‘मैं जानता हूं, तू सप्तर्षि-मंडल है-नर रूपी नारायण है, जीवों के कल्याण की कामना से तूने देह धारण की है....’’
नरेन्द्र का कहना है कि उनके मुख से ऐसी बातें सुनकर मैं एकदम अवाक् और स्तम्भित रह गया। सोचा, यह तो निरा पागलपन है। मैं विश्वनाथ दत्त का पुत्र, मुझसे वे यह क्या कह रहे है! उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर दोबारा कहा, ‘‘मुझे वचन दे कि तू मुझसे मिलने फिर अकेला आएगा और शीध्र।’’
नरेन्द्र ने इस अद्भुत स्थिति से छुटकारा पाने के लिए वचन तो दे दिया,
‘‘मैं जानता हूं, तू सप्तर्षि-मंडल है-नर रूपी नारायण है, जीवों के कल्याण की कामना से तूने देह धारण की है....’’
नरेन्द्र का कहना है कि उनके मुख से ऐसी बातें सुनकर मैं एकदम अवाक् और स्तम्भित रह गया। सोचा, यह तो निरा पागलपन है। मैं विश्वनाथ दत्त का पुत्र, मुझसे वे यह क्या कह रहे है! उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर दोबारा कहा, ‘‘मुझे वचन दे कि तू मुझसे मिलने फिर अकेला आएगा और शीध्र।’’
नरेन्द्र ने इस अद्भुत स्थिति से छुटकारा पाने के लिए वचन तो दे दिया,