उसके लिए संघर्ष और बलिदान। फिर किसी एक राष्ट्र, किसी एक देश की स्वाधीनता नहीं, विश्व के सभी देशों की स्वाधीनता, नर-नारी सभी की जंजीरें टूट जायें और सभी उन्नत मस्तक हों। इसके लिए सुनाई पड़ता है कठोरनिषद का उद्घोष-उत्तिष्ठत जागृत वरान निवोधत-‘उठो, जागो और जब तक तुम अपने अंतिम ध्येय तक नहीं पहुंच जाते, तब तक चैन न लो।’’
एक छोटी-सी कविता देखिए:
शिव-संगीत
(कर्नाटी-एक ताल)
ताथैया ताथैया नाचे भोला,
बम बम बाजे गान।
उसके लिए संघर्ष और बलिदान। फिर किसी एक राष्ट्र, किसी एक देश की स्वाधीनता नहीं, विश्व के सभी देशों की स्वाधीनता, नर-नारी सभी की जंजीरें टूट जायें और सभी उन्नत मस्तक हों। इसके लिए सुनाई पड़ता है कठोरनिषद का उद्घोष-उत्तिष्ठत जागृत वरान निवोधत-‘उठो, जागो और जब तक तुम अपने अंतिम ध्येय तक नहीं पहुंच जाते, तब तक चैन न लो।’’
एक छोटी-सी कविता देखिए:
शिव-संगीत
(कर्नाटी-एक ताल)
ताथैया ताथैया नाचे भोला,
बम बम बाजे गान।