डिमिडिम डमरू बाजे डोलती, कमाल-माल।
गरजे गंगा जटा मांझे, उगले अनल त्रिशुल राजे,
धक् धक् धक् मौलिबंध ज्वले शशंक भाल।
व्याख्या की आवश्यकता नहीं। क्रान्ति का स्वागत-तांडवन नाच शब्दों से व्यक्त है ! इसी प्रकार ‘काली माता’ में कहा है:
‘‘साहसी, जो चाहता है
दुःख, मिल जाना मरण से,
नाश की गति नाचता है
मां उसी के पास आई।’’
1899 में लिखे गये ‘नवभारत’ निबंध का उल्लेख हम पहले कर आये हैं। फिर इन्हीं दिनों दूसरी बार
डिमिडिम डमरू बाजे डोलती, कमाल-माल।
गरजे गंगा जटा मांझे, उगले अनल त्रिशुल राजे,
धक् धक् धक् मौलिबंध ज्वले शशंक भाल।
व्याख्या की आवश्यकता नहीं। क्रान्ति का स्वागत-तांडवन नाच शब्दों से व्यक्त है ! इसी प्रकार ‘काली माता’ में कहा है:
‘‘साहसी, जो चाहता है
दुःख, मिल जाना मरण से,
नाश की गति नाचता है
मां उसी के पास आई।’’
1899 में लिखे गये ‘नवभारत’ निबंध का उल्लेख हम पहले कर आये हैं। फिर इन्हीं दिनों दूसरी बार