विदेश जाते हुए उन्होंने यूरोप यात्रा के संस्मरण लिखे, जो पहले ‘उद्बोधन’ में और फिर पुस्तिका रूप में प्रकाशित हुए। लोगों का कहना था कि विवेकानन्द ने ये संस्मरण लिखकर अपनी योग्यता कि धाक जमाई। लेकिन धाम जमाना उनका अभिप्राय कभी नहीं रहा। उनके सम्मुख आगे आने वाला महान संघर्ष था और वे एकनिष्ठा से समूचे राष्ट्र को वेदान्त के विराम चिहृ को लांघ चुके थे। उनकी दृष्टि बहुत स्पष्ट थी और उनका विश्लेषण ऐतिहासिक भौतिकवाद के निकट आ
विदेश जाते हुए उन्होंने यूरोप यात्रा के संस्मरण लिखे, जो पहले ‘उद्बोधन’ में और फिर पुस्तिका रूप में प्रकाशित हुए। लोगों का कहना था कि विवेकानन्द ने ये संस्मरण लिखकर अपनी योग्यता कि धाक जमाई। लेकिन धाम जमाना उनका अभिप्राय कभी नहीं रहा। उनके सम्मुख आगे आने वाला महान संघर्ष था और वे एकनिष्ठा से समूचे राष्ट्र को वेदान्त के विराम चिहृ को लांघ चुके थे। उनकी दृष्टि बहुत स्पष्ट थी और उनका विश्लेषण ऐतिहासिक भौतिकवाद के निकट आ