योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

पर मन में सोचा कि फिर यहां नहीं आऊंगा।

वे बैठक में लौट आए। वहां दूसरों की मौजुदगी में जो बातें हुई, उनमें पागलपन का लेशमात्र भी न थी।

रामकृष्ण ने नरेन्द्र के जन्म के बारे में अपने शिष्यों को भावावेश में एक अद्भुत कथा सुनाई थी। वह कथा रोमां रोलां ने अपनी पुस्तक -विवेकानन्द’ में यों बयान की हैः

‘‘एक दिन समाधि में मैंने पाया कि मेरा मन प्रकाश के पथ पर ऊंचाा उठ रहा है। तारा जगत् को पार करके वह शीघ्र ही विचारों की सूक्ष्मतर


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पर मन में सोचा कि फिर यहां नहीं आऊंगा।

वे बैठक में लौट आए। वहां दूसरों की मौजुदगी में जो बातें हुई, उनमें पागलपन का लेशमात्र भी न थी।

रामकृष्ण ने नरेन्द्र के जन्म के बारे में अपने शिष्यों को भावावेश में एक अद्भुत कथा सुनाई थी। वह कथा रोमां रोलां ने अपनी पुस्तक -विवेकानन्द’ में यों बयान की हैः

‘‘एक दिन समाधि में मैंने पाया कि मेरा मन प्रकाश के पथ पर ऊंचाा उठ रहा है। तारा जगत् को पार करके वह शीघ्र ही विचारों की सूक्ष्मतर


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