‘‘सभी जातियों के आदिम पुरूष जो पाते थे, वही खाते थे। किसी जानवर को मारकर उसे एक महीने तक खाते थे, सड़ जाने पर भी नहीं छोड़ते थे। धीरे-धीरे लोग सभ्य हो गये। खेती-बाड़ी होने लगी। जंगली जानवरों की तरह एक दिन खूब खाकर चार-पांच दिन भूखे रहने की प्रथा उठ गई। रोज़ भोजन मिलने लगा, फिर भी बासी और सड़ी वस्तुओं का खाना नहीं छूटा। पहले सड़ी-गली चीजें आवश्यक भोजन थी, पर अब वे चटनी अचार के रूप में नैमित्तिक भोजन हो गयी हैं।’’ (दशम खंड, पृष्ठ 82)
‘‘सभी जातियों के आदिम पुरूष जो पाते थे, वही खाते थे। किसी जानवर को मारकर उसे एक महीने तक खाते थे, सड़ जाने पर भी नहीं छोड़ते थे। धीरे-धीरे लोग सभ्य हो गये। खेती-बाड़ी होने लगी। जंगली जानवरों की तरह एक दिन खूब खाकर चार-पांच दिन भूखे रहने की प्रथा उठ गई। रोज़ भोजन मिलने लगा, फिर भी बासी और सड़ी वस्तुओं का खाना नहीं छूटा। पहले सड़ी-गली चीजें आवश्यक भोजन थी, पर अब वे चटनी अचार के रूप में नैमित्तिक भोजन हो गयी हैं।’’ (दशम खंड, पृष्ठ 82)