पाश्चात्य देशो में इस समय एक साथी ही लक्ष्मी और सरस्वती दोनों की कृपा हो गई है। केवल भोग की चीज़ों ही को एकत्र करके वे शांत नहीं होते, वरन् सभी कामों में सुंदरता देखना चाहते हैं। खान-पान, घर-द्वार सभी में सुंदरता की खोज है। जब धन था, तो हमारे देश में भी एक दिन यही भाव था। इस समय एक ओर दरिद्रता है, दूसरी ओर हम लोग इतो नष्टस्ततो भ्रष्टः होते जा रहे हैं। जाति के....जो गुण थे वे मिटते चले जा रहे हैं और पाश्चात्य देश से भी
पाश्चात्य देशो में इस समय एक साथी ही लक्ष्मी और सरस्वती दोनों की कृपा हो गई है। केवल भोग की चीज़ों ही को एकत्र करके वे शांत नहीं होते, वरन् सभी कामों में सुंदरता देखना चाहते हैं। खान-पान, घर-द्वार सभी में सुंदरता की खोज है। जब धन था, तो हमारे देश में भी एक दिन यही भाव था। इस समय एक ओर दरिद्रता है, दूसरी ओर हम लोग इतो नष्टस्ततो भ्रष्टः होते जा रहे हैं। जाति के....जो गुण थे वे मिटते चले जा रहे हैं और पाश्चात्य देश से भी